a Welcome to India policy foundation

साम्प्रदायिक दंगों से उठते सवाल और उर्दू अखबार

Author: IPF      Date: 15 Sep 2012 15:15:07

जब देश कठिन दौर से गुजर रहा हो और विशेषकर अन्यान्य कारणों से देश के ताने-बाने पर प्रहार किया जा रहा हो तब मीडिया की भूमिका अहम हो जाती है। किस समाचार को कितना और किस रूप में प्रस्तुत किया जाता है यह महत्वपूर्ण हो जाता है। मीडिया समाचार-विचार संप्रेषण का सशक्त माध्यम है। मीडिया की दो भूमिका अपेक्षित रहती है। पहली सच को उजागर कर हिंसा, अफवाह, दंगा, नफरत, और परस्पर वैमनस्य फैलाने वाले लोगों को उजागर करना। इसके साथ प्रशासनिक, पुलिस एवं संस्थाओं की भूमिका का आकलन करना। दूसरा, इस तरह की घटनाओं को फैलने से रोकना। अर्थात मीडिया संक्रमण को रोकने में जिम्मेदार भूमिका निभाती है। इसका दायित्व होता है कि घटनाएं स्थानीय बनकर रह जाए। एक स्थान का वैमनस्य, नफरत, हिंसा अन्य स्थानों तक नहीं पहुंचे।
परंतु उर्दू अखबारों की समसामयिक भूमिका अत्यंत ही असंतोषप्रद है। म्यांमार में बौद्ध और मुस्लिमों के बीच संघर्ष हुआ। हिंसात्मक घटनाएं हुईं। जान-माल की क्षति हुई। संघर्ष का स्वरूप म्यांमार राज्य बनाम मुस्लिम समुदाय हो गया। इससे भारत में आक्रोश हो सकता है। यह अस्वाभाविक नहीं है। इसे शांति मार्च निकालकर, उपवास कर सांकेतिक रूप मंे अभिव्यक्त किया जा सकता था। परंतु हुआ इसके विपरीत। म्यांमार की महामारी को भारत में उसी तरह से आयातित किया गया जैसे 1921-22 मंे तुर्की की खिलाफत के हटाने से उत्पन्न आक्रोश को भारत में आयातित किया गया था। हिंदुओं ने खिलाफत आंदोलन में सहयोग किया था। परंतु वैचारिक कट्टरता और हिंसक प्रशिक्षण व्यक्ति/समुदाय को पशुता से भी निम्न दर्जे का बना देती है। केरल में मुसलमानों ने बिना किसी उत्तेजना के हिंदुओं के साथ हिंसा, आगजनी, बलात्कार एवं बलात धर्म परिवर्तन कराने का कुकृत्य किया। इसे मोपला दंगे के रूप में जानते हैं। दशकों तक माक्र्सवादी विचारकों एवं इतिहासकारों ने इसे आर्थिक संघर्ष का नाम देकर व्याख्या करने की कोशिश की थी। परंतु यह सत्य को झूठ का जामा पहनाने का काम था। माक्र्सवादी नेता इ.एम.एस. नम्बूद्रीपाद ने भी अंततः माना कि मोपला दंगा आर्थिक के साथ-साथ सांप्रदायिक था।
उसी खिलाफत मानसिकता से ग्रस्त लोग आज भी भारत में विदेशों की उन घटनाओं से जिससे देश या देश के मुसलमानों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नहीं है। उसके घातक वाहक बन रहे हैं। 1921 और 2012 में कितनी समानता है। म्यांमार को लेकर देश के दर्जनों हिस्सों में उग्र प्रदर्शन एवं हिंसक वारदातें हुईं। क्या यह पंथनिरपेक्षता है? राज्य इस पर चुप्पी लगाकर बैठी रही तो सवाल उठता है कि मोपला से मारद तक और कोकराझार से कानपुर तक सांप्रदायिक तांडव करने का विशेषाधिकार एवं राज्य का प्रश्रय औपनिवेशिक काल से अब तक क्यों दिया जाता रहा है? भारतीय समाज को इस प्रश्न का समाधान ढूंढ़ना होगा। ऐसे में उर्दू अखबारों की भूमिका क्या रही? इस प्रश्न का उत्तर जानना इसलिए आवश्यक हो जाता है कि देश का एक बड़ा वर्ग अपनी राय बनाने के लिए, सूचना समाचार प्राप्त करने के लिए पूरी तरह इनपर निर्भर होता है। उर्दू के एक बड़े वर्ग ने इन घटनाओं को अतिश्योक्ति, अफवाहों, आक्रामक और अमर्यादित रूप से समाचारों, चित्रों, विश्लेषणों एवं संपादकीयों में परोसा। अफवाह और हिंसा पर लगाम लगाने की जगह वे इसके सशक्त माध्यम बनकर पेश आए। प्रेस काउंसिल और सूचना प्रसारण मंत्रालय मूकदर्शक बने रहे। यदि यदि भारत सरकार अपने वर्नाकुलर प्रेस की जानकारी प्राप्त करने में अक्षम है तो स्वतंत्र शोध संस्था भारत नीति प्रतिष्ठान के वेबसाइट से ज्ञान बोध कर सकती है। परंतु ज्ञानबोध तो उसे कराया जाता है जिसकी पात्रता हो।
यदि सरकार गंभीर होती तो कोलकाता से प्रकाशित दैनिक आजाद हिंद में प्रकाशित खबरों एवं चित्रों को लेकर उचित कार्रवाई करती। इसमें 3 अगस्त के अंक में (देखें पृष्ठ संख्या 17) पूरे पृष्ठ पर म्यांमार में कथित हत्या के शिकार लोगों के चित्र प्रकाशित कर समुदाय विशेष को भड़काने, उत्तेजित करने और प्रतिशोधात्मक स्वरूप प्रदान करने का प्रयास हुआ।
इन चित्रों का स्रोत क्या है? उसकी प्रमाणिकता क्या है? क्या वे म्यांमार के ही चित्र हैं और अब की घटनाओं के प्रतिबिम्ब हैं? अगर है भी तो पूरे पृष्ठ में उत्तेजक चित्रों को प्रकाशित करने के पीछे मानसिकता क्या है? क्या यह प्रेस काउंसिल के निर्देशों का उल्लंघन, गृहमंत्रालय के सर्कुलर और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के आदेशों को तार-तार करने वाला कदम नहीं है? असम और म्यांमार की घटनाओं को लेकर देश भर में उत्तेजना, हिंसा और विभाजक मानसिकता पैदा करने की कोशिशें हुईं। मुंबई में 11 अगस्त को क्या हुआ? असम एवं म्यांमार की घटना से शहीद स्मारक पर प्रहार करने की प्रेरणा कैसे आई? उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, झारखंड, दिल्ली सहित अनेक राज्यों में हिंसा की घटनाओं पर राज्य और धर्मनिरपेक्षता के पैरोकार महात्मा गांधी के तीन बंदर बनकर आंख, कान और मूंह बंदकर अपने वास्तविक चरित्र को निर्लज्जतापूर्ण उजागर करते रहे। यही है धर्मनिरपेक्षवादियों का कुनबा या खानदान जो मारद (2003) की घटना पर भी तीन बंदर बने रहे थे। इस अधर्मिता और नग्न निर्लज्जता को तथ्यों और तर्कों से परस्त करने की आवश्यकता है।
उर्दू अखबारों में एक वर्ग ऐसा भी है जो इसके सांप्रदायिक और कट्टर छवि से अलग रहकर मुख्यधारा की मीडिया की तरह पेश आना चाहता है। परंतु अनेक कठिनाई है।
अभी हाल में प्रतिष्ठान में एक बड़े उर्दू अखबार के संपादक अपनी पहल से आए। उन्होंने कहा कि उनके सहकर्मी पत्रकार उनके पंथनिरपेक्ष मिशन का विरोध करते हैं, असहयोग करते हैं। वे तर्क देते हैं कि सर्कुलेशन (प्रसारण) गिर जाएगा। उनका पाठक अफवाह और कटुतापूर्ण समाचार और विश्लेषण पढ़ने का आदि है। इस ‘अजीज बर्नी मानसिकता’से उर्दू अखबारों को बाहर निकलना चाहिए। इस मानसिकता से पाठकों के नाम पर आगे बढ़ाना राष्ट्रीय एकता और अखंडता को बेपर्दा एवं बेआबरू करने जैसा है।
उर्दू अखबारों की इस भूमिका पर यह अंक पत्रकार-चिंतक श्री मनमोहन शर्मा की टीम ने तैयार की है।
आशा है यह उर्दू मीडिया की भूमिका को समझने में मदद करेगा। क्या भारत सरकार राष्ट्रीय खंडता को चलनी बना देने के उर्दू मीडिया के इस मिशन पर लगाम लगाने का सामथ्र्य रखती है? जब तक अफवाहों एवं विभाजनकारी मानसिकता वाले संपादकों एवं अखबारों को प्रधानमंत्री अपने निवास पर चाय-पानी कराते रहेंगे, राजनीतिक वोट बैंक की नाराजगी के भय से आतंकित रहेंगे, उनपर लगाम लगाना असंभव है।
अंतिम बात, इस देश में जो शांति काल के दंगाई हैं वे वास्तव में धर्म निरपेक्षता, और राष्ट्रीय एकता के शत्रु हैं एवं उर्दू अखबारों का एक बड़ा वर्ग उनका वैचारिक जमीन तैयार करता है।

-प्रो. राकेश सिन्हा